Tuesday, February 23, 2010

तुम मुझे दो मैं तुम्हे दूंगा

तुम मुझे दो मैं तुम्हे दूंगा

मैने एक छोटा सा पामेरियन कुत्ता पाला हुआ है . कोमल ,सुन्दर , प्यारा. उसका काम भौकना है और यह काम बडे शौक से करता है. मेन गेट के पास कोई आया नहीं कि कमरे के दरवाजे को धक्का देकर भाग खडा होता है भोंकने लगताहै. चक्कर काट काट कर, उछल उछल कर भोंकता है . इस समय यदि मैं उसे आवाज दूं तो वह इस व्यस्तता के बीच भी,एक बारमेरे पास आकर मुंह ऊंचा कर क्षण भरके लिये ही सही,खडा हो जाता है और पुन:अपने अ-आबंटित कार्य में व्यस्त हो जाता है. उसे सबसे ज्यादा परेशानी होती है घर के सामने से लाऊड स्पीकर लगा कर तेज आवाज मे प्रचार करते लोगों और फटाकों की आवाजोंसे . फटाके की आवाज सुनाई देने पर वह अत्यंत भयभीत हो कर कोनों में दुबकने की कोशिश करने लगता है और उसे इस समय एक मित्र की तरह सम्भालना पडता है.. परंतु लाऊड स्पीकर की आवाज उसे क्रोधित कर देती है और मेन गेट पर कूद कूद कर भों कते हुए अपनी नाराजगी प्रकट करने लगता है.

मेरे इस प्यारे कुत्ते का नाम रोमियो है.ज्यादातर लोग अपने कुत्ते का नाम विदेशी स्टाईल का ही रखतें हैं. हमने भी इसी परिपाटी को मानते हुए इसका नाम रोमियो रखा. हमने शेरु , सोनु , हीरा टाइप देशी नामों से परहेज किया.विदेशी नस्ल के कुत्ते का नाम तो देशी हो ही नहीं सकता है. ऐसे घर मे रोमियो को कोई कुत्ता नहीं कहता है.
रोमियो आजकल अति व्यस्त हो गया है. लाऊड स्पीकर लेकर प्रचार करने वालों का तातां लगा रहता है. आदतन गुस्से से उबलता हुआ रोमियो मेन गेट के पास आ कर पूरी ताकत से भोकं कर अपने दिल का गुबार निकालता रहता है. नगर निगम का चुनाव होने को है और अचानक ढेर सारे समाज सेवक पैदा हो गये हैं. उन समाज सेवकों के पीछे भी अचानक भीड प्रकट हो गईहै .इन दोनों की सयुक्त उपस्थिति ने हमारे रोमियो को उत्तेजित कर दिया है.
आज एक समस्या और खडी हो गई . मेरे घर के नल की टोंटी टूट गई. उस टोटी सॆ पानी धीरे धीरे निकल कर घर के आंगन मे फैल गया औरा आंगन से निकल कर घर के सामने की सडकमे जिसमें ढेर से गड्ढे हैं, बहने लगा. ये गड्ढे उसी प्रक्रिया के अंतर्गत बने थे जिसमें सरकारी विभाग कई बार गड्ढे खोदता है और कई बार वहीं गड्ढे पाटता भी है. वोट मांगने वाले उन्ही गड्ढों के बीच से मेंढक की तरह उछल उछल कर जा रहे थे. उन्हे अपने उजले कपडों को गन्दे पानी से बचाने की चिंता हो रही थी.

एक समस्या तो टोंटी खराब होने कीथी ही, दूसरी समस्या रोमियो महाशय ने खडी कर दी. पूरी ईमानदारी से भोंक कर पानी भरे आंगन से ही छप छप करता घर के भीतर घुस जाता था और सोफे पर याबिस्तरे पर पसर जाता था. प्फिर अचानक मेन गेट पर चुनावी दंगलबाजों की आवाज सुन कर "कर्म करो फल की आशा म त करो" को चरितार्थ करने दरवाजे पर छप छप करते आ धमकता था.. रोमियो के बारबार गीले होने से श्रीमती जी का मिजाज गर्म होने लगा.उसने आदेश प्रसारित कर दिया कि तुरंत प्लम्बर की व्यवस्था की जाए
प्लम्बर की व्यवस्था के आदेश पालन हेतु मैं जैसे ही गेट से निकला, एक वोट आकांक्षी से भिडंत हो गई. उन्हे समाज सेवा के लिये हमारे पूरे परिवार के वोट की जरूरत थी. मैने उनसे पूछा कि मोहल्ले मे तो मैने उन्हे कभी नहीं देखा.उनके कुछ कहने के पहले ही उनके टैंचे ने जवाब दिया कि भैया जी बाजू के मोहल्ले से हैं. वह मोहल्ला महिलाओं के लिये आरक्षित होने के कारण भैयाजी इस मोहल्ले से चुनाव लड रहे हैं. उन्होने यह भी दावा किया कि भैयाजी के चुनाव जीतने के बाद इस मोहल्ले की कायापलट हो जाएगी. भैयाजी ने हाथ जोड कर कहा ' आप का आशीर्वाद चाहिये".जो मैं उस समय कह सकता था वही कहा "जरूर, जरूर".मन में सोचाकि किस किताब में लिखा है किपार्षद बन कर ही समाज सेवा की जा सकती है.उनके ताम झाम को देख कर लग रहा था कि वे सज्जन पैसे खर्च करने में कोई कंजूसी नहीं कर रहे थे.उनके जीवन का परम लक्ष्य शायदपार्षद बनना था. एक गलत सोच,अव्यवहारिक सोच मेरे मन मे आया कि इतना पैसा यदि नि:स्वार्थ समाज सेवा मे लगाते तो कितनों का आशीर्वाद स्वत: ही इन्हे मिल जाता.
अचानक मुझे नल की टोटी का ख्याल आया .उसी समय भावी पार्षद जी ने कहा" भाई साहब, भूलियेगा नहीं,मेरा चुनाव चिन्ह नल है . उस पर ही मोहर लगाइयेगा."

लोहे की दुकान कुछ ही दूरी पर थी. पर वहां पहुंचते तक झंडे बैनरसे लदी हुई कई गाडियां ' वोट दो वोट दो ' चिल्लाती मुझे पार कर गईं .लोगों के झुंड के झुंड उन समाज सेवकों को उनकी मंजिल तक पहुंचाने के लिये वोट मांग रहे थे. चलते चलते मैं यह सोच रहा था कि इन अनपड मजदूरो के मांगने से क्या कोई वोट देता है. क्या उनके चिल्लाने का कोई असर समान्य जनो पर होता है? फिर मुझे लगा कि चुनाव में खडे होने वाले लोगों के जज्बे को सलाम कहना चाहिये जो महगाई के समय मे भी ढेर सा पैसा लगा कर समाज सेवा के लिये दिन और रात एक कर रहें हैं.मैं अनुमानित व्यय की भूल भुलैया में कुछ देर के लिये चलते चलते ही खो गया.
लोहे की दूकान पर पहुंच कर मैने दूकानदार को अपनी समस्या बताई. उनसे अनुरोध किया कि तुरंत एक प्लम्बर घर भेज दें. दूकानदारने मुस्कुराने में कोई समय नहीं लगाया. उसने कहा"बंधु,चुनाव का मौसम है. प्लम्बर पिछले एक सप्ताह से नहीं आया है और चुनाव के निपटते तक तो पक्का है, वह नहीं आयेगा" मैने उससे अनुरोध किया कि किसी दूसरे प्लम्बर की व्यवस्था कर दे. कार्य अति आवश्यक है.मेरे अनुरोध पर दूकानदार ने तुरंत प्रतिक्रिया दी"सम्भव ही नहीं है" .उसने तथ्यों के साथ जो वस्तुस्थिति बताई उसने मेरे ज्ञानचक्षु खोल दिये. उसने बताया कि अभी कोई भी प्लम्बर नल सुधारता नहीं दिखाई देगा. ये सभी चुनाव प्रचार में लगे हुए हैं . अगर मजदूर चाहिये तो वे भी आपको नहीं मिलेंगे. एक दिन की रोजी उन्हे अभी दो सौ रुपये मिलती है. मुफ्त में शराब की बोतलें भी मिल रही हैं. खाने के लिये बिर्यानी और मुर्गे की व्यवस्था की जाती है. उसने कहा कि ये तथाकथित समाजसेवक चुनाव जीतने के लिये इनकी बस्तियों में शराब के साथ साथ और भी बहुत सी चीजें बांटते हैं . मुझे जान कर आश्चर्य हुआ कि ये तो वोट पाने के अमोघ अस्त्र हैं. इन प्रपंचो के बि ना तो कोई चुनाव जीत ही नहीं सकता है.
मैने कहा ' भाई, पर मेरी समस्या का क्या होगा? टोंटी खराब है और पानी बरबाद हो रहा है." दुकानदार ने कहाकि मैं टोंटी निकाल लाऊ .वह नई टोंटी दे देगा. उसे लगाना भी मुझे ही पडेगा.उसने बातों ही बातों मे एक बात और भी बताई.जबसे तीन रुपये प्रति किलो के हिसाब से मजदूरों को चावल मिलने लगा है,मजदूर मिलने मुश्किल हो गये हैं.
मैने दूकानदार से यूं ही पूछ लिया कि प्रत्येक प्रत्याशी कितना खर्च कर होगा? मुझे लगने लगा था कि यह दूकानदार इस क्षेत्र का प्रकांड पंडित है.
"लाखों रुपये खर्च कर रहे हैं लोग.जिसकी जितनी सामर्थ्य है उतना खर्च कर रहे हैं.अब तो बिना पैसे के चुनाव जीतना केवल कल्पना है. दारू,मुरगा, साडी कम्बल बांटने के लिये पैसे तो लगेंगे ही. इसके बगैर आप चुनाव जीत ही नहीं सकते हैं. मेरी जानकारी मे इसका कोई अपवाद नहीं है."
मैंने उस सर्वज्ञ से पूछा" क्या खर्च की सीमा तय नहीं है"
"नहीं"
एक सवाल मेरे मन में घुमड रहा था ;पूछ ही लिया"लोग इतना खर्च क्यों करते हैं?"
"आप भी अजीब हैं! दुनिया जिसका जवाब जानती है वह सवाल आप पूछ रहे हैं."
एक बडी सी गाडी धूल उडाती सामने से निकल गई. दूकानदार ने बताया कि ये ग डी वाले साहब भी पार्षद बनने की होड में हैं समाजसेवा करने का नया नया शौक चढा है. कुछ समय पहले इनकी आर्थिक स्थित ठीक नहीं थी ,अब लोग कहते हैं कि ये करोडों में खेलते हैं.पैसा कहाँ से आया किसी को नहीं मालूम. समाचार यह है कि कुछ दिनों से झुग्गी झोपडियों में इनके द्वारा दारू नियमित रूप से बंटॅवाई जा रही है.आज कपडॆ भी बांटे जाने की खबर है.'
" इन सब प्रक्रियाओं के बारे आप इतने विस्तार से कैसे जानते हैं" मैने दूकानदार से जिज्ञासाशांत करने के लिये पूछ लिया.
" मैं एक बार चुनाव में खडा हो चुका हूँ और मैं चुनाव हार गया था."यह मेरे लिये सम्भावित उत्तर था.

"
चुनावी शोर के बीच मैं घर आ गया .मेरी समस्या का समाधान नहीं हो पाया था.मुझे रोमियो की चिंता हो रही थी . पानी में भीग भीग कर बीमार ना हो जाए.मेरे घर में पानी बह रहा था और बाहर लोग पानी की तरह पैसा बहा रहे थे. चुनाव जीतने के लिये समाज सेवाक दारू की नदी बहा रहे थे और लोग उसमे डुबकी लगाने के बाद नाली के किनारे औंधे पडॆ हुए गन्दे पानी से स्नान कर रहे थे. मुझे समझ मे नहीं आ रहा था कि यह कैसा चुनाव है जिसमे समाज सेवक अनैतिक कार्य के माध्यम से चुनाव जीतना चाहते हैं. छद्म सेवा के नाम पर दूसरे मोहल्ले में जाकर चुनाव लडते हैं.सेवा करने की ऐसी प्रचंड इच्छा है तो इसी तरह खर्च कर अपना मोहल्ला क्यों नहीं सुधारते हैं. पार्षद बन कर ही समाज की सेवा करनी है ऐसा मंत्र किस गुरु ने कान में फूंका है? मुझे लगरहा था कि पार्षद बनने के पश्चात निश्चित रूप से कुछ असाधारण की प्राप्ति होती होगी जिसे मेरे जैसा असामाजिक नहीं जानता है.
मैं टोंटी खोलने का प्रयत्न कर. रहाथा. प्रचारकों का प्रचार शोर अनियंत्रित ऊंचाई तक पहुंच चुका था. थका हुआ रोमियोनिस्पन्द सा सोफे पर पडा हुआ नीद ले रहा था.उसने जान लिया था कि इस चुनाव में उसके चिल्लाने से कोई फर्क पडने वाला नहीं है. शायद उसने समझ लिया था कि उससे ज्यादा जोरों से चिल्लाने वाले मेन गेट के बाहर बहुतायत से एकत्रित हो चुके हैं..

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